The way knowledge moves is very subtle

Unpublished Letters

Osho’s letter to Krishna Saraswati, 18 February 1971 – with a Sufi story. English translation by Ma Priyanshi.

Osho's Letter to Krishna Saraswati, 18 February 1971
Osho’s Letter to Krishna Saraswati, 18 February 1971 – Download original file from Sannyas.Wiki

English translation

Dear Krishna Saraswati,

Love.

Subtle is the inherent nature of knowledge.

And often: unfathomable.

Not only what is being said, but ultimately its consequences are equally important.

Krishnamurti is focused on the half-truth — only on the part which is being said.

So, what he says, that is all right but results are generally not favorable because to whom it is said; his condition — his potential — his interpretation is totally ignored.

And what Mehar Baba says, that is not all right, but results are generally favorable because to whom it is being said; that very person remains the focus.

Definitely, my problem is much bigger than both of these; because I talk and live both the ways.

That is why, my statements are generally inconsistent.

And I know this very well.

In fact, deliberately my statements are inconsistent.

I do not have the desire for consistency.

You will ask: reason?

Reason is: for the welfare and joy of the larger humanity.

Sometimes, I speak the truth — naked and nude — as it is.

And with whomsoever I talk — I surely consider that person.

Exactly contrary to that, sometimes I also speak as it is not — but as an outcome of which truth and good can happen.

But that too I speak keeping in view whom I am speaking to.

I will tell you a story:

A man once went to a Sufi saint and said, “My wife is sterile — you please do some treatment.”

That Sufi saint was a famous doctor too.

The Sufi saint looked towards his wife and said, “Sorry! I cannot start the treatment because within forty days this lady will die.”

Certainly, that lady had fallen sick as hell, and in the deep sorrow of death she stopped taking food.

But forty days passed — and she did not die. The husband was too happy and went to the Sufi saint. The husband said, “Your unfortunate prediction has gone in vain.”

The Sufi saint replied, “I know, but now she will remain no more sterile. This prediction was a sort of treatment.”

Astonishingly, the husband asked, “Treatment! What type of treatment is this?”

The Sufi saint said, “The way knowledge moves is very subtle. Your wife’s obesity was the main cause of her being sterile. And except the fear of death there was no other way to prevent her from overeating. So, now she is healthy and free from being sterile.”

Of course, the way knowledge moves is very subtle.

And HIS ways are unique.

Rajneesh Ke Pranaam
18.02.1971

Translation by Ma Priyanshi (Dr Pankaj Prakash) — updated 21.5.2020

Hindi original

acharya rajneesh

A-1 WOODLAND PEDDAR ROAD BOMBAY-26. PHONE: 382184

प्रिय कृष्ण सरस्वती,
प्रेम। ज्ञान की गति सूक्ष्म है।

और अवसर : बेबूझ।

जो कहा जाता है, वही नहीं — अन्ततोगत्वा उसके परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

कृष्णमूर्ति का ध्यान आधे सत्य पर ही है — जो कहा जाता है उसपर ही।

इसलिए जो वे कहते हैं, वह ठीक है लेकिन परिणाम अक्सर ही अनुकूल नहीं होते हैं।

क्योंकि, जिससे कहा जाता है, उसका–उसकी स्थिति का — उसकी व्याख्या का बिल्कुल ही ध्यान नहीं रखा जाता है।

और मेहेर बाबा जो कहते हैं, वह ठीक नहीं है लेकिन उसके परिणाम अक्सर ही अनुकूल आते हैं। क्योंकि, जिससे कहा जाता है, उसको ही केन्द्र में रखकर कहा जाता है।

निश्चय ही मेरी कठिनाई दोनों से गहरी है; क्योंकि मैं दोनों ही भांति बोलता और जीता हूँ।

इसलिए मेरे वक्तव्य साधारणतः असंगत हैं (Inconsistent )ही होते हैं।

और यह मैं भलीभांति जानता हूँ।

वस्तुतः तो वे जान-बूझकर ही असंगत है।

संगत (Consistent) होने का लोभ मैंने नहीं रखा है।

पूछोगे : कारण ?

कारण हैः बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।

कभी मैं सत्य ही बोलता हूँ — निर्वस्त्र, नग्न — जैसा है, वैसा ही।

जिससे बोलता हूँ — उसको ही ध्यान में रखकर।

कभी मैं उसके ठीक विपरीत वह भी बोलता हूँ जैसा कि नहीं है — लेकिन जिसके व्दारा परिणाम में सत्य और शुभ फलित होसकता है।

लेकिन, वह भी जिससे बोलता हूँ — उसको ही ध्यान में रखकर।

एक कहानी तुमसे कहूँ :

किसी सूफी फकीर के पास एक आदमी गया और बोलाः ‘ मेरी पत्नी बांझ है — आप कुछ चिकित्सा करे।’

वह फकीर प्रसिद्ध चिकित्सक भी था।

फकीर ने स्त्री को देखा और कहाः ” क्षमा करें क्योंकि मैं चिकित्सा नहीं कर सकूंगा क्योंकि यह स्त्री किसी भी स्थिति चालीस दिन के भीतर मर जायेगी।

निश्चय ही वह स्त्री खाट से लग गई और मृत्यु के दुख में उसने खाना-पीना छोड़ दिया।

लेकिन, चालीस दिन बीत गये और वह नहीं मरी।

खुशी में पति ने जाकर फकीर को कहा कि आपकी दुर्भाग्यपूर्ण भविष्यवाणी व्यर्थ गई है।

फकीर ने कहाः” वह मैं जानता हूँ लेकिन अब वह बांझ नहीं रहेगी — यह भविष्यवाणी मेरी चिकित्सा थी!”

पति ने चकित हो पूछाः “चिकित्सा ? यह कैसी चिकित्सा है ?”

फकीर ने कहाः “ज्ञान की गति सूक्ष्म है। तुम्हारे पत्नी का मोटापा ही उसके बांझ होने का कारण था। और मृत्यु के भय के अतिरिक्त उसे भोजन से रोकने का और कोई उपाय न था। इसलिए, अब वह स्वस्थ है और बांझपन से मुक्त। ”

निश्चय ही ज्ञान की गति सूक्ष्म है।

और उसके मार्ग अनूठे हैं।

रजनीश के प्रणाम

१८/२/१९७१

प्रतिः
स्वामी कृष्ण सरस्वती.
अहमदाबाद.

Original text in Hindi thanks to www.sannyas.wiki

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